विपदाओं ने ऐसा घेरा
निकल न पाया कभी सवेरा
किरणें फैलीं नील गगन पर
धरती पर तो रहा अंधेरा
अंधकार में पुंज तलाशा
उससे दीप जलाता हूॅ
मैं चाणक्य बनाता हूॅ
शौर्य बंॅधा हो बाजू में
ऑख़ों में अंगार सजी हो
तर्क पूज रहे शब्दों को
संासों में हुंकार भरी हो
विद्रोह से विद्रोह करे जो
उनको शीश नवाता हूॅ
मैं चाणक्य बनाता हूॅ
शत्रु जब शास्त्रों को भूलें
शस्त्रों की भाषा पहचाने
परमपिता को शीश नवाकर
हत्या, वध में अंतर जाने
गंगाजल का आचमन करके
दिव्य प्रत्यंचा खनकाता हूॅ
मैं चाणक्य बनाता हूॅ
अमित त्यागी
Sundar rachna Amit jee
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